बस यूं ही ..!

अजीब सी दौड़ है ये ज़िन्दगी– 

जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं,

और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं !!
:-चन्द्र प्रताप सिंह

मां सिर्फ एक शब्द नही पूरी दुनिया है..।

दोस्तों ,” मदर्स डे ” पर क्या लिखूं  क्या नहीं लिखूं यही सोच रहा था,  कौन सी माँ के बारे में लिखूं…? वो माँ जो इक पवित्र भावना  है। संवेदना  है, कोमल अहसास है। तपती दोपहरी में मीठे पानी का झरना  है। इक खुशबु है। वो माँ जो कभी मिटती नहीं, देह  मिट भी जाये तो अपने बच्चों की देह में रूह बन कर सिमट जाती है। उनके लब पर दुआ तो कभी मन में अहसास बन कर ढल जाती है। ऐसे करोड़ो शब्दों में, मैं उसे व्यक्त करूँ भी तो वो अव्यक्त  ही रह जायेगी।

दोस्तों , मैं आज उस माँ  की बात करता हूं, जो बेसन की रोटी पर खट्टी चटनी जैसी  लगती थी | मैं उस माँ की बात भी कर रहा जिसका  बेटा परदेश में रोता था तो देश में उसका प्यार भीग जाया करता है| मैं  मेक्सिम गोर्की की माँ  की बात भी कर रहा हूं और जीजा बाई की भी बात जिसने इक बालक को शिवाजी  बना  दिया । सब मां महान थी, और होती हैं। बस देखने का एक नज़रिया चाहिये।
सब मां एक प्रतिरूप होती है, उस विधाता की या, शायद वो विधाता इस मां की परछाई मात्र है । मां वो होती है जो बच्चों के अहसासो को बीना व्यक्त किये समझ लेती है, उन्हें तो हमारा वो दर्द भी पता चल जाता है जिससे हम अनभिज्ञ रहते हैं, हमपे कोई अपदा आ जाती है तो वो रो पड़ती हैं। हमारे एक छोटे से दर्द से भी तड़प उठती है, चोट हमें लगे लेकिन पीड़ा उन्हें होती है, हां हर मां ऐसी ही होती है।
मां को समर्पित मेरी कुछ पंक्ति…
मां तू मेरे ममता का आंचल ।

तू मेरे आंखों का काजल,

बसती तू सांसों मे हरपल॥
तेरी दूरी से है तड़पन,

तू मेरी है दिल की धड़कन

तुझ बिन बिखरा हूं मै कण-कण ॥
तुझ बीन मै बंजारा सा,

पगला सा आवारा सा,

गुमसुम सा बेचारा सा ॥
तुम मेरे जीवन का छाया,

जो कम कुछ ज्यादा , है आया,

सब कुछ मै तुमसे ही पाया ॥
दिल अगर मै तो धड़कन तुम हो,

उड़ती धुल मै, तुम बारिश का कण हो,

मै भटका मुसाफिर, साहिल तुम हो ॥
इस जीवन मे जबसे आया।

मां तेरा ही आंचल का साया,

धूप छांव मे, सर पे पाया ॥
मां तू मेरे ममता का आंचल ।

तू मेरे आंखों का काजल,

बसती तू सांसों मे हरपल॥
सभी माताओं-बहनों को मातृ दिवस की अनेक शुभकामनाएँ, क्योंकि बहन भी मां का एक अंश होती हैं।

अनकहा दर्द ।

तनिशा शादी के बहुत दिन बाद घर पर आयी थी, वैसे तो पहले हम दोनो मे झगडा बहुत होता था । हम दोनों साथ मे रहते थे तो पूरा दिन लडाई, लेकिन हम एक दूसरे से प्यार भी बहुत करते थे । तनिशा मेरे पापा के मित्र की छोटी बेटी, वैसे तो वो शैतानों की नानी थी, हम बचपन से साथ पढ़ते थे इसलिए हम एक दूसरे की दिल की सारी बातें जानतें थे, बीना बोले ही हम एक दूसरे की भावनाओं को समझ जाते थे ।
सुबह का समय था बस कुछ पुरानी यादों मे डूबे हुये चाय की चुस्कीयां का मजा ले रहा था तभी फोन बजा, देखा तो अपरचीत नम्बर से फोन था, फोन उठाया दूसरे तरफ से आवाज आयीं “का हो शैतान बाबू का हाल चाल है” आवाज सुनकर बोला चाचा आप, कैसे हो और नम्बर ……? कुछ और बोल पाता की चाचा बोल पडे, सब ठीक है, और हा नम्बर-वम्बर छोडो और घर पे आ जाओ तनिशा आयी है । तनिशा…..! सच पापा मै अभी आता हूं, इतना सुनने भर की देरी थी कि मम्मी को आवाज लगा के कहा, मम्मी मे मिश्रा चाचा के घर जा रहा हूं थोडा देर हो जायेगी आने मे और बाईक उठाया और चल दिया थोडी देर बाद मै फिर उन यादों के बीच पहुंच गया था, जहा बचपन मे हमे वो आनन्द मिल जाता था जो आज के लग्जरी घरों मे भी नही मिलता बहुत पुरानी यादे ताजा करते हुये मैने डोरबेल बजाई, कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो देखा तनिशा सामने थी । कैसी है रे पगली वो एक प्यारी सी मुस्कान के साथ दरवाजे पे खडे़-खडे़ सिर्फ मुझे ही देख रही थी, उसे हल्के से हिलाते हुये बोला क्या रे अन्दर नही बुलायेगी क्या, चल हट दरवाजे से पगली । उसको हटाते हुए और चाची को आवाज लगाते हुए अन्दर आ गया । चाचा-चाची कहीं जा रहे थे, चाचा मुझे बोले आ गया बडा़ शैतान । उसके बाद चाची बोली बेटा हम कुछ काम से बाहर जा रहे है २ घण्टे बाद अायेंगे तब तक तनिशा के पास रुक जा शाम को खाना खाने के बाद चले जाना, मै बोला कोई बात नही चाचा वैसे भी बहुत दिनों का झगडा बाकी है इससे। चाचा बोले तुम दोनों शैतानों कभी नही सुधरोगे और मुस्करा के चले गये । चाचा के जाने के बाद मै बोला चल चाय बना फिर बैठके बात करते है, वो किचन मे चली गयी, और थोडी दरे बाद चाय लेकर वापस आयी, तब तक मै बोल पडा क्या रे पगली खुश तो है ना तू……  ससुराल वाले अच्छे है ना, तेरा खयाल तो रखते है ना ? 
वो बिना बोले चाय पी रही थी, ओये कुछ बकेगी या सर फोडू तेरा उसके बाद बतायेगी क्या…? तुझे हो क्या गया है जब से आया हूं मै अपनी पुरानी तनिशा को ढूढ़ रहा हूं लेकिन वो पता नही कहाँ खो गयी है, और जब से आया हूं एक बात नोट कर रहा हूं, मै रेडियो की तरह बज रहा हूं और तूं सिर्फ मुस्करा रही हो, बातों का जवाब सर हिला के से रही है, मुझे पता है तू खुश नही है, है ना……! क्या बात है…..? जब से दरवाजे पे देखा तब से मै परेशान हूं चल अब तू ये बता की बात क्या है….?
वो बोली छोड़ ना भाई तू भी….. मै खुश हूं । भूख लगी होगी ना क्या बनाऊ…..? चुप…..और मुझे भूख नही लगी है, सच-सच बता क्या बात है…..? बता रही है या मै जाऊ….. उसकी आंखे भर आयी, बोली नही भईया मत जाओ बहुत दिन का दर्द है अन्दर बस आपके साथ बांटने के बाद थोडा कम होगा, वो रोते हुये मेरे गले से लग कर बोली भईया, अपनी शादी के बाद भाभी को बहुत प्यार देना और कभी अकेलेपन का आभास ना होने देना……. अबे वो पगली ये तु……. अब बतायेंगी भी या यूं पहेलियाँ………?
भाईया इतना सब कुछ करने के बाद भी सब ताने क्यों मारते है, क्या इतना देने के बाद भी इनका पेट नही भरता, क्यों भईया…..,

हम लडकियों को ही ये सब सुनना पड़ता है, आखिर क्यों..? 
उसकी बातों से अब मै सारी बातें समझ चुका था की वो क्या कहना चाहती थी । 
मित्रों आज हमारे समाज मे ये दहेज रुपी बीमारी एक लास्ट स्टेज पे पहुंचे एक कैंसर के रोगी जैसी हो गयी है, अांपरेशन करने पे भी रोगी की मौत पक्की और इलाज ना करने पर भी । कब तक हमारी बहनें ऐसे ताने सुनेगी….? कब तक दहेज के नाम पे बेटिया और बहनें जलायी जाती रहेंगी, कब तक गला दबा के मारी जाती रहेगी कब तक, आखिर कब तक….?
मुझे याद है की रोशनी की शादी मे चाचा ने कुल मिलाकर २० लाख का खर्च किये थे, मै मना किया था की चाचा औसत दर्जे का घर देखकर शादी कर लो लेकिन, नही चाचा एक हाई क्लास का लडका ढुढ रहे थे, बहुत समझाया लेकिन नही, बस यही बोलकर मुझे चुप करा देते थे की एक ही बेटी है अच्छे घर मे शादी कर दूं बस उसके बाद आराम से मर सकूँगा । 
चाचा ने रोशनी की शादी मे अपना और चाची का फिक्स डिपोजिट तुड़वा दिये थे और अपना कुछ खेतों को भी बेच दिये थे वो अपने लिये कुछ भी नही रखें थे । वो अपने जीवन का हर सहारा सिर्फ तनिशा की खुशी के लिये कुर्बान कर दिये थे । फिर भी तनिशा को ताने, दुत्कार, और सासुराल वालों का जुल्म सहकर रहना पड़ता है, वो ये सारी बाते चाचा को भी नही बता सकती क्योंकि अगर ये सारी बातें चाचा सुन लेंगें तो एक पल भी नही जी पायेंगे ।
आज तक तनिशा सब दुख को चाचा-चाची से छुपा के इतने मासूमी से रहती है जैसे की वो ससुराल मे बहुत खुश है । सलाम तनिशा तूझे और हर उन बहन बेटियों को जो ये सारे जुल्मों को बस ये सोचकर सहती रहती है ताकी उनके मां, बाप, और भाई हमेशा खुश रहे । कभी वो पश्चाताप रुपी आग मे ना जलते रहे, वो कभी ये ना सोच की उनका फैसला गलत है और ऐसी बहुत सारी बाते है जो हर एक तनिशा सोचती है । और घर वालों को ये सब ना बताकर खुद सबकी प्रताड़ना, ज़ुल्म को बस हंसकर सहती है ताकि, उनके मम्मी, पापा, भाई सब पश्चाताप की आग मे ना जले‌।
कुछ तनिशा इनको पूरे उम्र भर झेलती रहती है तो कुछ हार कर खुद को खत्म कर लेती है, और कुछ का तो उनके ससुराल वालों द्वारा उनका दुखद अन्त कर दिया जाता है । जो दर्द बेटिया हंस कर सह लेती है, उसका २५% भी घर के बेटों पर आ जाये ना तो पता नही क्या हो ।
आज मेरा एक सवाल है, हर उन माता, पिता, भाई, बहन, और सभी से, क्या आप जो रोशनी के साथ कर रहें हो अगर वही व्यवहार आपकी बहन और बेटी के साथ की जाये तो आपको कैसा लगेगा । यार इतना भी नही समझ मे आता की एक बाप जो अपनी बेटी के लिये खुद को बेच दिया है वो अब और क्या बेचेगा, धिक्कार है । इतना भी समझ नही हैं तुममे की जो बाप अपनी सबसे अनमोल और कीमती चीज अपनी बेटी को दे दिया हो उससे ज्यादा क्या चाहिए आपको….?
कुछ दिन बाद तनिशा ससुराल चली गयी, और मेरी भी छुट्टी खत्म हो गयी थी तो मुझे भी शहर आना पडा, और मै फिर अपने कामों मे थोडा व्यस्त हो गया धीरे-धीरे समय बीतता गया कभी-कभी तनिशा से बात हो जाया करती थी, बस जीवन को जिल्लत और आसूंओ के साथ जी रही थी, कभी-कभी चाचा से बात हो जाती थी, वो बोलते थे । देखा बेटा तनिशा अपने घर पे खुश है, मै तो बैकुठ कर लिया उसकी खुशी मे मेरी खुशी चाचा की बात सुनकर बस तनिशा को सलाम करता था इतना सब कुछ सहते हुये भी कुछ नही बोलती थी ताकि चाचा को कोई तकलीफ और अफसोस न हो, धीरे-धीरे समय बीतता गया वक्त और समय के साथ मै भी समय आभाव के कारण तनिशा से जल्दी बात नही कर पाता था, महीने मे एक दो बार हो जाती थी, मै आफिस के काम से कुछ दिनो के लिये बाहर चला गया था करीब १० दिन के बाद वापस आया तो मुझे एक चिट्ठी मिली शायद कल ही आयी थी, जिसे पढ के मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी और मै शिथिल होकर वहीं जमीन पे बैठ गया ….
पत्र ऐसा था__

मेरे प्यारे भैया,
        कैसे हो, हां पता है अब बोलोगे मस्त.  एकदम मस्त….. तू बता…..? मै बोलूंगी मस्त हूं फिर आप बोलोगे……. छोड़ो बात को बिना घुमाये बताती हूं, भैया एक बात बोलनी है, I Love You भैया पता है एक आप ही हो जो मेरा दर्द, गम, खुशी अहसास सब बिना बताये जान लेते हो वैसे सच बताऊ तो आप मेरे सुपरहीरो हो, पता है जब आप कभी मुझे ज्यादा परेशान करते थे तो मन करता था आपके कान खीच के बहुत मारू, सच बोलू तो अपके साथ रहती थी तो मै बहुत खुश रहती थी जीवन सतरंगी सी लगती है । ऐसा लगता है इन्द्रधनुष के सारे रंग मेरे भैया मे उतर आये है, और मै उस रंग मे उतर जाना चाहती थी, और उसको सिर्फ देखती ही नही थी, उसको छूकर उसका एक-एक अहसास अपने जीवन मे उतार लेती थी, आप मेरे आदर्श हो भैया……..! 

हे ठहर जा रे पागली तुझे पता नही तेरा भाई कितना शैतान है अब तक उसके दिमाग मे क्या-क्या पक गया होगा, रुक नही तो सारे पके हुये चीज जल जायेंगे …….सही कहाँ ना….! सोच रहे होगे मेल और संदेश के जमाने मे ये चिट्ठी क्यों …….? फोन भी तो कर सकती थी… और पता नही क्या-क्या ?

तो मेरे पगले और प्यारे भैया जी, मन किया तो लिख दिया वैसे ज्यादा मत सोचो पहले मेरी बात सुनो ।

भैया आप बहुत प्यारे और अच्छे हो मतलब The Best पता है मेरा कोई भाई नही था लेकिन जब से आप से मिली मुझे मेरा बड़ा भाई मिल गया इतना प्यार मुझे अपना भाई भी नही दे पाता, कुछ दिन बाद रक्षाबंधन है भैया इसलिए मै राखी भेज रहीं हूं शायद ये मेरी आखरी राखी हो भैया इसके बाद मै शायद अपको कभी राखी नही भेज पाऊंगी लेकिन भैया आप मुझे अपने दिल मे हमेशा रखना, आप तो हमेशा मेरे दिल और मन मे रहोगे आप जैसा भाई सब को मिले भैया पता है एक बार आप से मिलना चाहती हूं लेकिन नही मिल पाऊंगी शायद कभी नही, इस बात का ग़म ताउम्र रहेगा और हमेशा रहेगा ।

पता है भैया इस बार जब से आयी हूं तब से लोग परेशान कर रहे है, कभी मुझे मारते है गाली देते है कभी……………. फिर भी भैया मै सब कुछ सह लेती थी बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले ताकि मेरी वजह से किसी को तकलीफ ना हो, जितने भी जुल्म होते है हंस के सह लेती थी । 

लेकिन भैया अब तो हद कर दिये है बोल रहे है, २ लाख अपने बाप से मांग नही तो तुझे…….? भैया आपका ये बहादुर बेटा अब हार गया है अब और ताकत न बची है की लड़ सकूं, थक गयी, हार गयीं हूं बस एक विराम चाहती हूं । अब रुकना चाहती हूं बैठना चाहतीं हूं बस बहुत भाग ली बहुत दिन तक, अब और नही होता भैया कब तक ये दर्द और जिल्लत दुख का रोना, बस हो गया भैया शायद यंही तक सफर था मेरा ।

अब एक ठहराव देना चाहती हूं । 

अब जिन्दगी के आगे एक पूर्णविराम देना चाहती हूं ।

भैया शायाद पापा को बोल के २ लाख दिलवा दू क्या फिर भी इनकी लालच …….? ये वहसी दरिंदे है, बहुत दे दिया दर्द पापा को अब नही देना चाहती । भैया अब तो अपका बहादुर बेटा फैसला कर ही ली बस हो गया भैया ।
“शायद यही था मंजूर खुदा को,

दिया ग़म जिल्लत आंसू मेरे हिस्से,

शायद कलम गयी टूट उनकी,

जब लिखनी थी कुछ पल खुशी के”
वैसे भैया अपकी शादी जब हो आप भाभी को बहुत प्यार देना, और हां उनको मेरा बहुत सारा प्यार कहना भैया जब तक आपको ये चिट्ठी मिलेगी तब तक शायद बहुत कुछ बदल जाये, मै शायद न रहूं लेकिन आप महसूस करना मेरा प्यार हमेशा आपके पास रहेगा । भैया जब आपको चिट्ठी मिलेगी मै सबसे दूर बहुत दूर हो गयी रहूंगी, और हा भैया आप उदास मत होना Always Be Happy समझे और हां मै भगवान से प्रर्थना करूंगी जब अगले जन्म मे आउ तो मेरे बड़े भाई आप ही हो तो भैया, अब उदास मत होना समझे I Love you भैया, आपके नाम ये मेरी आखरी चिट्ठी है ।

    अपकी बहादुर

    तनिशा(नन्हीं)
चिट्ठी हाथ मे ही थी नन्हीं को फोन लगाया उसका नम्बर बन्द आ रहा था, आंखो से गिर रहे आँसू पत्र को भिगो रहे थे । चाचा को फोन लगाया, फोन उठा मै बोला चाचा ….. चाचा रो के बोल पडे बेटा तेरी तनिशा ……. तनिशा नही रही……. कैसे क्यों सवाल करने के लिये मेरे पास शब्द नही थे अभी तक चिट्ठी के जरिये जिस बचपन वाली तनिशा के अहसास के साथ मै जी रहा था वो चिट्ठी हाथ से छूटी और इधर चाचा के ख्वाब के साथ मै टूट गया ।
और इसी प्रकार एक और तनिशा का दुखद अन्त हो गया ।
आखिर ये नयी सदी मे जी रहे लोगो की मानसिकता कब तक ये दहेज रूपी गुलामी की जंजीरों को झेलेगी इसे तोड़ना होगा और शुरुवात करनी होगी एक दहेज मानसिकता मुक्त समाज की । ताकि किसी तनिशा का फिर से अन्त न हो । अब हमे लड़ना हो, जागना होना नही तो अगली तनिशा हमारे घर से भी हो सकती है ।
:- चन्द्र प्रताप सिंह (आर्यन)

मजदूर दिवस..!

विघ्नों को गले लगाते हैं… काँटों में राह बनाते हैं… 

है कौन विघ्न ऐसा जग में .. जो टिक सके आदमी के मग में..!!

खम ठोंक ठेलता है जब नर.. पर्वत के जाते पाँव उखड़..

मानव जब जोर लगाता है… पत्थर पानी बन जाता है…!!
श्रमिक दिवस की ढेरों शुभकामनायें मित्रों… 

श्रमेव जयते.. 💪💪

माना मैं सबसे छोटा हूं…!

माना मै सबसे छोटा हूं, 

भले ही सिक्का खोटा हूं ।

मां-बाबा जब भी रोते है,

मै साथ मे उनके रोता हूं ।
दीदी का मै दुलार हूं,

छोटी का मै प्यार हूं।

उनको विदा करने के लिये,

कर रहा खुद को तैयार हूं ।
भाई का पुरा किस्सा हूं,

उसके मै डांट का हिस्सा हूं ।

हर बात छुपाने की उसकी,

उसके चीज़ों मे करता हिस्सा हूं ।
अब बात मैं मा की करता हूं,

सर उनके चरणों पे धरता हूं ।

मै‌ शुन्य, इकाई वो है,

मै गिरा, उठाई वो है ।
मै धुल चरण के उनकी,

मै पला शाय मे  जिनकी।

वो सागर मै मछली हूं,

वो अम्बर मै बदली हूं ।
जब बात बाबा की करता हूं,

एक अलग छवी सा भरता हूं ।

बाहर‌ से तो वो पत्थर है,

अन्दर उतना ही कोमल है ।
जब भी वो डांट लगाते हैं,

सौ बार मां से पुछ के आते है ।

वो ऐसे तो ना सोया है,

कुछ खाया भी या, न खाया है ।
माना मै सबसे छोटा हूं, 

भले ही सिक्का खोटा हूं ।

मां-बाबा जब भी रोते है,

मै साथ मे उनके रोता हूं ।

:- चन्द्र प्रताप सिंह

मनवा….!

सुनो चलो एक पीढ़ी बनाते है,

अपने यादों की एक सीढ़ी बनाते है,

थोड़ा उपर चढकर नीचे आयेंगें,

फिर से ख्वाबों की एक कडी बढ़ायेंगे,

धीरे-धीरे उतरते-चढ़ते जायेंगे,

ऐसे एक दिन अपने ख़्वाहीशों की मंजिल हम पा जायेंगे ।

:-चन्द्र प्रताप सिंह